Saturday, 15 June 2013

अंतर्यात्रा

मूळ श्लोक:

हृदयकुहरमध्ये केवलं ब्रह्ममात्रं
ह्यहमहमिती साक्षादात्मरूपेण भाती
हृदिविशमनसा स्वम चिन्वता मज्जता वा
पवनचलनरोधात आत्मनिष्ठो भवत्वं

- भगवान रमण महर्षी

अनुवाद:

हृदयकुहरीच्या| गाभार्यात साच|
ब्रह्म एकलेच| प्रकाशते||

आत्मस्फुरणेने | सनातन सत्य|
'मी' 'मी' असे नित्य| प्रत्यया ये||

कोहम शोध घेता| मन हो विलीन|
ईशपदी लीन| हृदयांतरी||

रोधुनिया प्राण| होई आत्मनिष्ठ|
बाकी इष्टानिष्ट| नसे काही||

(साच - खरोखर)

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